गुरुवार, अगस्त 06, 2009

भोजपुरी शकुन्तला (प्रस्तावना)

माटी के बोली में , माटी कै बाटि,
औ माटी कै गीत लिखै चलली हैं।
भाव कै सूघर आँगन में ,
अंगुरी धै के घुसकै चलली हैं ।।
बा बचकानी कै आंखि अजान ,
तबौ इ जहान लखै चलली हैं ।
तानि निशान न जानी कबौ,
तबो तीर कमान सिखै चलली हैं ।।
सन्मुख ऊची अदालत के ,
पग ना खड़ीयाय हहाय करेजा ।
भाव - कुभाव बा जौन मोरे ,
देहली बहिराय देखाय करेजा ।।
ना जानी काव करै भगवान,
नदान हयी , न दुखाय करेजा ।
पातरि बा कविताई मोरी ,
तबो नेह दिहा तू लगाय करेजा ।।
नाँव कै कीरति बा जेकरे ,
पनियां पर पाई जे पारत आइलें ।
बाहीं कै जोर बरोर बड़ा ,
चाहे धापत,चाहे उघारत अइलें ॥
पुण्य कै टाटी संवारे जहाँ ,
वहीँ पाप अटारी उजारत अइलें ।
वहि राजा भरत के भारत में ,
घर भर मिलिके महाभारत कइलें ॥
डॉ ईश्वरचंद्र त्रिपाठी

1 टिप्पणी:

  1. नमस्कार मित्र आप का बहुत बहुत धन्यबाद मई अपने आप को दुर्भाग्य शाली महसूस कर रहा हूँ की इतने दीं से आप की इतनी अमूल्य करती से दूर रहा
    मार प्राणम् स्वीकार करे
    सादर
    प्रवीण पथिक
    ९९७१९६९०८४

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